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MASLAK e ALA HAZRAT ZINDABAD

बारहवां महीना — ज़िलहिज्जा

इस्लामी साल का बारहवां महीना ज़िलहिज्जा है इसकी वजह तसमीया ज़ाहिर है इस माह में लोग हज करते हैं और उसके पहले अशरा का नाम कुरआन मजीद में अय्यामे मालूमात रखा गया यह दिन अल्लाह तआला को बहुत प्यारे हैं।

इसकी पहली तारीख को सैयदना हज़रत खातून जन्नत फातमा ज़ुहरा रज़ी अल्लाह तआला अन्हा का निकाह सैयदना हज़रत शेरे खुदा अली मुरतज़ा करमल्लाहो वज्हुल करीम के साथ हुआ। उसकी आठवीं तारीख को यौमे तरवीया कहते हैं। क्योंकि हुज्जाज उस दिन अपने ऊँटों को पानी से खूब सैराब करते थे। ताकि अर्फा के रोज़ तक उनको प्यास ना लगे। या इस लिये उसको यौमे तरवीया (सोच विचार) कहते हैं कि सैयदना हज़रत इब्राहीम खलील उल्लाह नबीयना अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने आठवीं ज़िलहिज्जा को रात के वक्त ख़्वाब में देखा था कि कोई कहने वाला कह रहा है कि अल्लाह तआला तुझे हुक्म देता है कि अपने बेटे को जबह कर। तो आपने सुब्ह के वक्त सोचा और गौर किया कि यह ख़्वाब अल्लाह तआला की तरफ से है या शैतान की तरफ से। इस लिये इसको यौमे तरवीया कहते हैं।

और उसकी नवीं तारीख को अर्फा कहते हैं। क्योंकि सैयदना हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने जब नवीं तारीख की रात को वही ख़्वाब देखा था तो पहचान लिया कि यह ख़्वाब खुदा तआला की तरफ से है। इसी दिन हज का फरीज़ा अंजाम दिया जाता है।

और दसवीं को यौमे नहर कहते हैं। क्योंकि इसी रोज़ सैयदना हज़रत इस्माईल अला नबीयना अस्सलातो वस्सलाम की कुरबानी की सूरत पैदा हुई। और उसी दिन आम मुसलमान कुरबानियां अदा करते हैं।

उसके बाद ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं के दिनों को अय्याम तशरीक कहते हैं। और उस माह की बारहवीं तारीख को हुज़ूर सरापा शाफए यौमुन्नुशूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने सैयदना हज़रत अली मुरतज़ा शेरे खुदा रज़ी अल्लाह तआला अन्हो से भाई चारा कायम किया था और उस माह की चौदहवीं तारीख को सैयदना हज़रत अली रज़ी अल्लाह तआला अन्हो ने नमाज़ में अपनी अंगूठी सदका की थी। और उसकी छब्बीसवीं तारीख को सैयदना हज़रत दाऊद अला नबीयना अलैहिस्सलातो वस्सलाम पर अस्तग़फार नाज़िल हुई थी। और सत्ताइसवीं को हादसा हुर्रा रूनुमा हुआ था कि यज़ीदियों ने मदीना मुनव्वरा पर हमला कर दिया था।

और इसी महीना की अट्ठाइसवीं तारीख को सैयदना हज़रत अली रज़ी अल्लाह तआला अन्हो मुस्नद खिलाफत थे।

माहे ज़िलहिज्जा की फज़ीलत : ज़िलहिज्जा का महीना उन चार बरकत और हुर्मत वाले महीनों में से एक है। इस मुबारक महीना में कसरत नवाफिल रोज़े तिलावत कुरआन तस्बीह व तहलील तकबीर व तशरीक और सदकात व खैरात वगैरह आमाल का बहुत बड़ा सवाब है और बिलखुसूस इससे पहले दस दिनों के इतनी फज़ीलत है कि अल्लाह तआला ने उस अशरह की दस रातों की कसम याद फरमाई है इरशाद होता है।

इस कसम से पता चलता है कि अशरा ज़िलहिज्जा की बहुत बड़ी फज़ीलत है। इसी तरह उनकी फज़ीलत से कुतुब अहादीस लबरेज़ हैं। चन्द मुबारक हदीसें सुनें।

सैयदा हज़रत उम्मे सल्लमह रज़ी अल्लाह तआला अन्हा फरमाती हैं कि रसूल खुदा हबीब किब्रिया सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिस वक्त अशरा ज़िलहिज्जा दाखिल हो जाये और तुम्हारा बाज आदमी कुरबानी करने का इरादा रखता हो तो चाहिये कि बाल और जिस्म से किसी चीज़ को मस ना करे। और एक रिवायत में है कि फरमाया कि बाल न कतराये और ना नाखुन उतरवाये। और एक रिवायत में है कि जो शख्स ज़िलहिज्जा का चांद देख ले और कुरबानी का इरादा हो तो ना बाल मुंडवाये और ना नाखुन तरशवाये। सैयदना हज़रत इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाह तआला अन्हो ने फरमाया कि रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि कोई दिन ऐसा नहीं है कि नेक अमल उसमें उन अय्याम अशरा से अल्लाह तआला के नज़दीक ज़्यादा महबूब हो। सहाबए केराम अलैहिमुर रिज़वान ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम जिहाद फी सबीलिल्लाह भी नहीं फरमाया जिहाद फी सबीलिल्लाह भी नहीं। मगर वह मर्द जो अपनी जान व माल लेकर निकला और उनमें से किसी चीज़ के साथ वापस नहीं आया। (सब कुछ कुरबान कर दिया)

सैयदना हज़रत अबु हुरैरा रज़ी अल्लाहो अन्हो नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम से रिवायत करते हैं कि आपने इरशाद फरमाया कि कोई ज़्यादा महबूब नहीं अल्लाह तआला की तरफ कि एबादत उनमें की जाये। उन दस दिनों ज़िलहिज्जा से उन दिनों एक दिन का रोज़ा एक साल के रोज़ों के बराबर है और उनकी एक रात का कयाम साल भर के कयाम के बराबर है। यही वजह थी कि सैयदना हज़रत साद जुबैर रज़ी अल्लाह तआला अन्हो फरमाते हैं कि दस रातों में चिराग ना बुझाओ। और खुद्दाम को उन रातों में जागने और एबादत करने का हुक्म दिया करते थे।

ज़िलहिज्जा के पहले नौ दिनों के रोज़े

ज़िलहिज्जा मुबारक के पहले अशरा के पहले नौ दिन रोज़ा बड़ा सवाब है। उम्मुल मोमिनीन सैयदा हज़रत हफ्सा रज़ी अल्लाह तआला अन्हा फरमाती हैं।

चार चीज़ों को नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम नहीं छोड़ते थे आशूरा का रोज़ा और (ज़िलहिज्जा) के दस दिन यानि पहले नौ दिन का रोज़ा और हर माह के तीन दिन का रोज़ा।

मज़हब इस्लाम में कुरबानी की अहमियत

मख़सूस जानवर को मख़सूस दिन में बनियत जबह करना कुरबानी है और कभी इस जानवर को अज़हिया व कुरबानी कहते हैं। जो जबह किया जाता है। कुरबानी क्या है? कुरबानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है जो उस उम्मत के लिये फर्ज़ की गई। और नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को कुरबानी करने का हुक्म दिया गया। अल्लाह तबारक व तआला इरशाद फरमाता है फसल्ले लिरब्बिक वनहर अपने रब के लिये नमाज़ पढ़ो और कुरबानी करो उसके मुतअल्लिक पहले चन्द अहादीस ज़िक्र की जाती हैं।

1हदीस :- अबुदाऊद तिरमिज़ी व इब्ने माजा के मारफत उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ी अल्लाह अन्हा से मर्वी है कि हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि वन्हर ( ) में इब्ने आदम का कोई अमल खुदा के नज़दीक खून बहाने (कुरबानी करने) से ज़्यादा प्यारा नहीं और वह जानवर बरोज़ क़यामत अपने सींग और बाल व खुरों के साथ उस कुरबानी का खून ज़मीन पर गिरने से कब्ल खुदा के नज़दीक मकामे कुबूलियत में पहुंच जाता है लिहाज़ा उसको ख़ुशी से करो।

2हदीस :- हज़रत इमाम हसन इब्ने अली रज़ी अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसने ख़ुशी दिल से तालिब सवाब कुरबानी की वह आतिशे जहन्नुम से हिजाब (पर्दा) हो जायेगी जहन्नुम में जाने से रोक दिया जायेगा। यानि आतिशे जहन्नुम से बच जायेगा।

3हदीस प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसमें ताकत हो और कुरबानी ना करे वह हमारे ईदगाह के करीब ना आये।

प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि सबसे पहले जो आज हम करेंगे 10वीं ज़िलहिज्जा को सबसे पहले बकरीद की नमाज़ पढ़ेंगे उनके बाद कुरबानी करेंगे। जिसने ऐसा किया वह मेरी सुन्नत को पा लिया मेरे तरीका को अपना लिया जिसने पहले जबह कर लिया वो गोश्त है जो उसने पहले से अपने वालों के लिये कर लिया गोया कि कुरबानी से उसे कोई सरोकार नहीं ताल्लुक नहीं यानि उसका कुरबानी हुआ ही नहीं।

हदीस :- प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जिसने ज़िलहिज्जा का चांद देख लिया (बकरीईद का) और उसका कुरबानी करने का इरादा है तो जब तक कुरबानी ना करे तबतक बाल और नाखुन को ना कटवाये ना तरशवाये।

फिर आगे फरमाते हैं कि कुरबानी में गाये सात की तरफ से और ऊँट भी सात की तरफ से कुरबानी करे।

चार किस्म के जानवरों की कुरबानी दुरुस्त नहीं

1काना जिसका कानापन ज़ाहिर हो 2— और वह बीमार जिसकी बीमारी हो 3— और लंगड़ा जिसका लंगड़ापन ज़ाहिर हो 4— जिसकी हड्डी में मगज़ न हो उसी के मिस्ल इमाम मालिक व अहमद व तिरमिज़ी अबुदाऊद व नसाई व इब्ने माजा व दारमी रज़ी अल्लाह अन्हो रावी हैं।

प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने कान कटे हों और सींग टूटे हुये की कुरबानी से भी मना फरमाया।

कुरबानी वाजिब होने के शराइत : इस्लाम यानि मुसलमान होना गैर मुस्लिम पर कुरबानी वाजिब नहीं अकामत यानि मुक़ीम होना मुसाफिर पर कुरबानी वाजिब नहीं। मालदार यानि मालिके निसाब होना यहां तक मालदारी से मुराद वही है जिसपर सदका फित्रा वाजिब होता है वह मुराद नहीं जिससे ज़कात वाजिब होती है। हुर्रियत यानि आज़ाद होना जो आज़ाद ना हो उसपर कुरबानी वाजिब नहीं कि गुलाम के पास माल ही नहीं लिहाज़ा एबादत मालिया उसपर वाजिब नहीं। मर्द होना इस के लिये शर्त नहीं। बाज औरतों पर भी वाजिब होती है जिस तरह मर्दों पर वाजिब होती है उसके लिये बालिग होना शर्त है या नहीं। इसमें इख्तेलाफ है। और नाबालिग पर वाजिब है तो आया खुद उसके माल से कुरबानी की जायेगी या उसका बाप अपने माल से कुरबानी करेगा। ज़ाहिरी रिवायत यह है कि ना खुद ना बालिग पर वाजिब है और ना उसकी तरफ से उसके बाप पर वाजिब है और इसी पर फतवा है।

कुरबानी के जानवर की किस्में और उनकी उम्रों का बयान

कुरबानी के जानवर तीन किस्म के हैं 1— ऊँट 2— गाये 3— बकरी-बकरा हर किस्म की इसकी जितनी किस्में हैं सब दाखिल हैं नर, मादा, खस्सी गैर खस्सी सबका एक ही हुक्म है यानि सब की कुरबानी हो सकती है भैंस गाये में शुमार है उसकी भी कुरबानी हो सकती है। वहशी जानवर जैसे नीलगाये और हरन की कुरबानी नहीं हो सकती कुरबानी के जानवर की उम्र यह होना चाहिये ऊँट पांच साल का, गाये दो साल की, बकरी एक साल की इससे उम्र कम हो तो नहीं ज़्यादा हो तो जायज़ बल्कि अफज़ल है हां दुम्बा या भेड़ का छह माही बच्चा अगर इतना बड़ा हो कि दूर से देखने में साल भर का मालूम होता हो तो उसकी कुरबानी जायज़ है।

कुरबानी करने का तरीका व दुआ

कुरबानी करने से पहले उसे चारा पानी दे दें यानि भूका प्यासा जबह न करें और ना एक दूसरे के सामने जबह करें और पहले से छुरी तेज़ कर लें ऐसा ना हो कि जानवर गिराने के बाद उसके सामने छुरी तेज़ की जाये जानवर को बायें पहलू पर इस तरह लिटायें कि किब्ला को उसका मुंह और अपना दाहना पांव उसके पहलू पर रखकर तेज़ छुरी से जल्द जबह कर दिया जाये और जबह से पहले यह दुआ पढ़ी जाये “इन्नी वज्जहतो वजहिये लिल्लज़ी फतरस्समावाते वलअर्ज़ हनीफो वमाअना मिनल मुशरिकीन।”

इस तरह जबह .करे कि चारों रगें कट जायें या कम अज़ कम तीन रगें कट जायें उससे ज़्यादा ना काटें ना छुरी गर्दन के मुहरा तक पहुंच जाये कि यह बेवजह तकलीफ है फिर जब तक जानवर ठंडा ना हो जाये यानि जबतक उसकी रूह बिल्कुल न निकल जाये उसके ना पांव वगैरह काटें ना खाल उतारें और अगर दूसरे की तरफ से जबह करना है तो मिन्नी की जगह मिन के बाद उसका नाम और अगर वह मुश्तर्क जानवर है जैसे गाय, ऊँट तो वज़न से गोश्त तकसीम किया जाये महज़ तखमीना से गोश्त तकसीम ना करें फिर उस गोश्त का तीन हिस्से करके एक हिस्सा फुक़रा पर तकसीम (बांटा) जाये और एक हिस्सा दोस्त व अहबाब के यहां भेजें और एक हिस्सा अपने घर वालों के लिये रखे और उसमें से खुद भी कुछ खा ले और अगर अहलो अयाल ज़्यादा हों तो तिहाई से ज़्यादा बल्कि कुल गोश्त भी घर में सर्फ (खर्च) कर सकता है और कुरबानी का चमड़ा अपने काम में भी ला सकता है और हो सके तो किसी नेक काम के लिये दे दे मसलन मस्जिद या दीनी मदरसा को दे दे या किसी फुक़रा को दे दे।

अकीका का बयान : बच्चा पैदा होने के शुक्रिया में जो जानवर जबह किया जाता है उसको अकीका कहते हैं हनफिया के नज़दीक अकीका मुबाह व मुस्तहब है अकीका से मुतअल्लिक कुछ हदीसें बयान कर रहा हूँ 1) तहावी में सुलेमान इब्ने हब्शी रज़ी अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत कि, कहते हैं कि मैंने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को फरमाते सुना कि लड़के के साथ अकीका है उसकी तरफ से खून बहाओ (यानि जानवर जबह करो) और उससे अज़ीयत को दूर करो यानि उसका सर मुंडवा दो आगे अबुदाऊद तिरमिज़ी एक सहाबीया रज़ी अल्लाह तआला अन्हा से रिवायत कि कहती हैं कि मैंने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को फरमाते सुना कि लड़के की तरफ से दो बकरियां और लड़की की तरफ से एक बकरी और उसमें हर्ज नहीं कि नर है या मादा अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली रज़ी अल्लाह तआला अन्हो की तरफ से बकरी जबह की और यह फरमाया कि ऐ फातमा उसका सर मुंडवा दो और बाल के वज़न के बराबर चांदी सदका करो।

अकीका के लिये सातवां दिन बेहतर है और सातवां दिन ना हो सके तो जब चाहें कर सकते हैं सुन्नत अदा हो जायेगी।

लड़के के अकीका में दो बकरी और लड़की में एक बकरी जबह किया जाये यानि लड़के में नर जानवर और लड़की में मादा जानवर मुनासिब है वैसे नर या मादा में कैद नहीं है हां बच्चा का जब सर मुंडा जाये तो बेहतर है कि सर पर ज़ाफरान पीस का लगा दिया जाये।

खतना :

खतना सुन्नत है और यह शआर इस्लाम में से है कि मुस्लिम और गैर मुस्लिम में इससे इम्तियाज़ पैदा होता है इसी लिये उर्फे आम में उसे मुसलमानी भी कहते हैं सहीह बुखारी व मुस्लिम में हज़रत अबु हुरैरह रज़ी अल्लाह तआला अन्हो से मर्वी है रसूल अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपना खतना खुद किया उस वक्त उनकी उम्र 80 साल की थी। खतना की मुद्दत सात साल से बारह साल की उम्र तक है और बाज उलमा ने यह फरमाया कि विलादत से सातवीं दिन के बाद खतना करना जायज़ है। (मसला) लड़के की खतना कर दी गई मगर पूरी खाल न कटी अगर आधे से ज़्यादा कट गई है तो खतना हो गई बाकी को काटना ज़रूरी नहीं और अगर निस्फ या निस्फ (आधे) से ज़ायद बाकी रह गई तो नहीं हुई यानि फिर से होनी चाहिये। मसला : बच्चा पैदा ही उस हाल में हुआ कि खतना में जो खाल काटी जाती है वह उसमें नहीं है तो फिर खतना कराने की हाजत नहीं और अगर कुछ खाल है जिसको खींचा जा सकता है मगर उससे सख्त तकलीफ होगी और हशफा (सुपारी) ज़ाहिर है तो हज़ामों को दिखाया जाता है अगर वह कह दें कि नहीं हो सकती तो छोड़ दिया जाये बच्चा को ख़्वाह मख़्वाह तकलीफ ना दी जाये। मसला : सुना जाता है कि जिस बच्चा में पैदाईशी खतना की खाल नहीं होती उसके बाप वगैरह उस रस्म को अदा करने के लिये अज़ीज़ो व अक़रबा को बुलाते हैं और खतना के कायम मुकाम पान की गुलूरी काटी जाती है। गोया इस से खतना की रस्म अदा की हो यह एक गलत हरकत है जिसका कुछ हासिल व फायदा नहीं। मसला : बूढ़ा आदमी मुशर्रफ बइस्लाम हुआ जिसमें खतना कराने की ताकत नहीं तो खतना कराने की ज़रूरत नहीं है। मसला : बालिग शख्स मुशर्रफ बइस्लाम हुआ अगर वह खुद ही अपनी मुसलमानी कर सकता है तो अपने हाथों से करे वर्ना नहीं हां अगर मुम्किन हो कि कोई औरत खतना करना जानती हो उससे निकाह करे अब उससे वह खतना करा ले। मसला : खतना कराना सबसे पहले बाप का काम है वह ना हो तो उसका वसी (वसीयत करने वाला) उसके बाद उसके दादा फिर उसके वसी का मरतबा है मामू या चचा या उनके वसी का यह काम नहीं है हां अगर बच्चा उनकी तरबियत व अयाल में हो तो कर सकते हैं।

औरतों के कान व नाक छेदवाने में कोई हर्ज नहीं

औरतों के कान व नाक छेदवाने में कोई हर्ज नहीं इस लिये के ज़माना रिसालत में भी कान व नाक छेदे जाते थे और उसपर कभी इन्कार नहीं हुआ। (फतवा आलमगीर) बल्कि कान व नाक छेदवाने का सिलसिला बराबर अब तक जारी है ( ) वैसे कान नाक छेदवाना हज़रत हाजरा रज़ी अल्लाह अन्हा की सुन्नत है।

ईसाले सवाब दूसरों के नाम करना कैसा है

ईसाले सवाब यानि कुरआन मजीद या दरूद शरीफ या कलमा तैयबा या किसी भी नेक आमाल का सवाब दूसरों को पहुंचाना जायज़ है। एबादत मालिया या बदनिया व नफिल सबका सवाब दूसरों को पहुंचाया जा सकता है।

ज़िन्दों के ईसाले सवाब से मुर्दों को फायदा पहुंचता है। कुतुब फेका अकायद में उसकी तशरीह मज़कूर है और शरह अकायद में इसका बयान मौजूद है। अब इसी बात को अगर कोई बिदअत कहता है तो उसकी हट धर्मी है क्योंकि हदीस शरीफ से भी इस बात का जायज़ होना साबित है। मुलाहज़ा फरमायें।

वाकेया : हज़रत साद रज़ी अल्लाह तआला अन्हो की वालदा का जब इन्तेकाल हुआ तो उन्होंने हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की खिदमत में अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम साद की माँ का इन्तेकाल हो गया है कौन सा सदका अफज़ल है। इरशाद फरमा दें तो प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि कुवां खुदवा दो और यह कहो कि साद की माँ के लिये है तो मालूम हुआ कि ज़िन्दों के आमाल से मुर्दों को सवाब मिलता और फायदा पहुंचता है पस जब हम असल कुल्ली बयान कर चुके तो जुज़यात के अहकाम खुद उसी कुल्लिया से मालूम हो गये। तीजा जो मरने से तीसरे दिन किया जाता है कि कुरआन मजीद पढ़वाकर या कलमा तैयब पढ़वाकर ईसाले सवाब करते हैं और बच्चों और अहले हाजत को चने, बताशे या मिठाईयां तकसीम करते हैं और खाना पकवा कर गुरबा व मसाकीन को खिलाते हैं या उनके घरों पर भेजते हैं जायज़ व बेहतर है फिर हर जुमेरात को हस्ब व हैसियत खाना पकाकर गुरबा को देते या खिलाते हैं फिर चालिसवें दिन खाना खिलाते हैं फिर छह महीने पर ईसाले सवाब करते हैं यह सब जायज़ है (बहारे शरीअत जि.16 स.243) उसके बाद बरसी सालाना फातिहा होती है यह सब इसी ईसाले सवाब के फरूअ में से हैं मगर यह ज़रूर है कि यह सब अच्छी नियत से की जाये नुमाइश ना हो वर्ना ना सवाब ही ना ईसाले सवाब बाज लोग इस मौके पर अज़ीज़ व अकारिब और रिश्तेदारों की दावत करते हैं तो यह मौका दावत का नहीं मोहताज व फकीरों के खिलाने का है जिससे मैयत को सवाब पहुंचे।

फातिहा बुज़ुर्गाने दीन

ईसाले सवाब में दाखिल है। उर्स बुज़ुर्गाने दीन रज़ी अल्लाहो अन्हुम अजमईन जो हर साल उसके विसाल के दिन होता है यह भी जायज़ है कि उस तारीख में कुरआन मजीद खत्म किया जाता है और उसका सवाब बुज़ुर्ग को पहुंचाया जाता है या मीलाद शरीफ पढ़ा जाता है या वाज़ कहा जाता है। बिलजुमला ऐसे उमूर जो बाइस सवाब व खैर व बरकत हैं जैसे दूसरे दिनों में जायज़ उन दिनों में भी जायज़ हैं हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम हर साल अव्वल और आखिर में शोहदाए उहद रज़ी अल्लाह अन्हुम की ज़ियारत को तशरीफ ले जाते हां यह ज़रूर है कि उर्स को फुज़ूल और खुराफात चीज़ों से पाक रखा जाये जाहिलों को ना मशरू हरकात से रोका जाये उसके बाद मना किया जाये। मना करने के बाद भी बाज ना आयें तो उनके अफआल का गुनाह उसके ज़िम्मा। जानकार आदमी की ज़िम्मादारी बस इतना है कि हर गलत काम से अपनों को (कम पढ़े लिखे लोगों को) रोका जाये ना कि ज़ोर ज़बरदस्ती किया जाये। (बहारे शरीअत जि.16 स.248)

नये साल की मुबारक बादियां

मुसलमानों में नये साल की पहले दिन यकुम जनवरी को ख़ुशी मनाने मिठाइयां बांटने मुबारक बादियां देने और भेजने का रवाज आम हो गया है और तरह की फुज़ूल खर्चियां की जाती हैं। हालांकि यकुम जनवरी हो या यकुम अप्रेल (अप्रेल फूल) 25 दिसंबर बड़ा दिन हो या गुड फ्राइडे उन सब का इस्लाम और मुसलमानों से कोई ताल्लुक नहीं बल्कि उनको अहमियत देना या त्योहार समझना इसाइयत है और काफिरों और गैर मुस्लिमों का तरीका है। मुसलमानों को चाहिये कि इस्लामी त्योहार को ही मनायें और इस्लामी दिनों को अहमियत दें इसाइयत ना अपनायें।

कहीं ऐसा ना हो कि आपका हशर इसाइयों के साथ हो हदीस पाक में है अल्लाह तआला के रसूल सैयद आलम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं जो जिस कौम का तरीका कार अपनाये वह उन्हीं में से है आजकल मुसलमानों में बच्चों का साल गिरह मनाने का रवाज भी बहुत हो गया है और उसमें गैर ज़रूरी अखराजात किये जाते हैं। मसलन केक काटे जाते हैं इस्लामी नुक्ता नज़र से यह सब भी कुछ अच्छा नहीं मालूम होता। इसमें अंग्रेज़ी तहज़ीब और इसाइयत की बू आती है। लिहाज़ा सब खुराफात से बचना चाहिये।